19 मार्च 2019 - 19:03
नौरोज़ के बारे में विशेष कार्यक्रम- 3

नौरोज़ को इसके विभिन्न मानवीय, नैतिक व प्राकृतिक आयामों और विशेषताओं के कारण असाधारण महत्व प्राप्त हो जाता है।

नौरोज़ के जो संस्कार हैं उन्हें संसार के हर स्थान पर अच्छा समझा जाता है जैसे ग़रीबों की सहायता, प्रकृति की रक्षा और बड़ों के सम्मान जैसी बातें संसार में हर समाज में वांछित व सराहनीय हैं। जिस बात ने नौरोज़ को गतिशील और अमर बना रखा है वह इसका अन्य संस्कारों, आस्थाओं व संस्कृतियों से समन्वित होना है। नौरोज़ की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे सीमाओं में बंद नहीं किया जा सकता और यह हर क्षेत्र की स्थानीय रीतियों के साथ मेल खाता है और सभी लोग इसे स्वीकार कर सकते है। यही इसकी व्यापकता का राज़ है।

ईदे नौरोज़, ईरान का एक अत्यंत प्राचीन पर्व है जो भलाई, पवित्रता, सच्चाई और प्रेम का सूचक है। यह पर्व तीन हज़ार वर्ष से अधिक समय से मनाया जा रहा है और ईरान की संस्कृति, सभ्यता व परंपराओं का प्रतिबिंब है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह इस देश के लोगों की संयुक्त मान्यताओं को दर्शाता है। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो नौरोज़ चीन से लेकर भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्रों तक में मनाया जाता रहा है और समय बीतने के साथ साथ इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विचार और संस्कार भी शामिल हो गए हैं। यद्यपि आज नौरोज़ के संस्कार इस व्यापक भौगोलिक क्षेत्र के हर स्थान पर अलग-अलग रूप धारण कर चुके हैं लेकिन उनका मूल ईरानी स्वरूप अब भी बाक़ी है।

हर साल वसंत ऋतु और हिजरी शमसी साल के पहले दिन पूरे संसार में ईरान "हफ़्त सीन" या सात सीन नामक दस्तरख़ान पर बैठते हैं और नया साल प्रेम व ख़ुशी से भरे वातावरण में शुरू करते हैं। सुफ़रए हफ़्त सीन नामक दस्तरख़ान सजाना, नौरोज़ की सुंदर व मनमोहक परंपराओं में से एक है और नया साल आरंभ होने के आध्यात्मिक अवसर पर पूरे परिवार के इकट्ठा होने का एक बहाना और प्रफुल्लता व प्रसन्नता का प्रतीक समझा जाता है। "हफ़्त सीन" के दस्तरख़ान को सीन या स से आरंभ होने सात चीज़ों से सजाया जाता है जिनमें मुख्य रूप से उगने वाली चीज़ें होती हैं।

"हफ़्त सीन" के दस्तरख़ान पर जो चीज़ें प्रायः रखी जाती हैं उनमें से एक "सब्ज़ा" है। यह गेहूं, मसूर या माश का अंकुर होता है जो जीवन के दोबारा शुरू होने का प्रतीक है। "समनू" गेहूं के अंकुर से बनने वाला एक प्रकार का हलवा है जो वनस्पतियों के पुनर्जन्म का प्रतीक है। सेब भी "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान पर रखा जाता है और स्वास्थ्य व सुंदरता का चिन्ह है। सिन्जिद एक प्रकार का खट्टा फल, सुमाक़ एक खट्टे फल का पाउडर और सीर अर्थात लहसन भी "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान पर रखे जाते हैं, ये सब जीवन में गतिशीलता, स्वास्थ्य और ख़ुशी के प्रतीक है। इसके अलावा "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान पर सिरका भी रखा जाता है जो संयम का प्रतीक है क्योंकि इसे तैयार होने में काफ़ी समय लगता है।

इन सबके अलावा भी ईरान कुछ अन्य चीज़ें "हफ़्त सीन" के दस्तरख़ान पर रखते हैं जैसे रंगे हुए अंडे जो जन्म व सृष्टि के प्रतीक होते हैं। पारदर्शिता के प्रतीक के रूप में आईना भी इस दस्तरख़ान पर सबसे आगे रखा जाता है। पानी, विभूति व प्रकाश के प्रतीक के रूप में और इस्फंद महीने की निशानी लाल मछली, जीवन व गतिशीलता के रूप में "हफ़्त सीन" के दस्तरख़ान पर दिखाई देते हैं। इसी तरह पूंजी व श्रम के प्रतीक के रूप में सिक्का और प्रकाश व ऊषमा के प्रतीक के रूप में मोम बत्ती को भी "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान पर रखा जाता है। कई पौधों की शाखाएं भी इस विशेष दस्तरख़ान का भाग होती हैं जिनके फूलों की ख़ुशबू बसंत के आगमन की शुभ सूचना देती है।

लोग तरह तरह की मिठाइयां भी "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान पर रखते हैं लेकिन इस बीच एक बहुत ही अहम चीज़ भी इस दस्तरख़ान पर होती है जो हर ईरानी "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान पर रखता है। वह है  ईश्वरीय किताब क़ुरआने मजीद। इस दस्तरख़ान पर क़ुरआने मजीद का जलवा बहुत विशेष होता है और वह इसके मुख्य स्तंभों में से एक है। यहीं पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि ईरान के कुछ क्षेत्रों में "हफ़्त सीन" दस्तरख़ान के साथ ही एक और दस्तरख़ान लगाया जाता है और उस पर सफ़ेदी व पवित्रता के प्रतीक के रूप में दूध या दही रखा जाता है। इसी तरह नए साल में बरकत के लिए लोग रोटी, पनीर और सब्ज़ी इत्यादि भी रखते हैं।

नया साल आरंभ होने के समय एक प्राचीन आस्था के आधार पर परिवार के सदस्य नहा धोकर नए कपड़े पहनते हैं क्योंकि कहा जाता है कि नया साल आरंभ होने के समय नए वस्त्र पहनना अच्छा होता है। इस काम का तात्पर्य अपने शरीर के साथ ही आत्मा को पवित्र बना कर उसे नए जीवन के लिए तैयार करना होता है। इस प्रकार मानो लोग एक नए जीवन के साथ "हफ़्त सीन" के दस्तरख़ान पर बैठते हैं और नया साल शुरू होते ही बड़े आध्यात्मिक माहौल में उस समय की विशेष दुआ पढ़ते हैं जिसका अनुवाद हैः हे दिलों व आंखों को बदल देने वाले!, हे रात और दिन की युक्ति करने वाले! और हे हालत और परिस्थितियों को बदलने वाले! हमारी हालत को भी सबसे अच्छी हालत में परिवर्तित कर दे।

इसके बाद सभी क़ुरआने मजीद की कुछ आयतों की तिलावत करते हैं। आम तौर पर नया साल शुरू होने के बाद घर का बड़ा व्यक्ति ईदी के रूप में परिवार के सदस्यों को पैसे या तोहफ़ा देता है और सभी मिठाई खाते हैं और एक दूसरे को ईद या नए साल की बधाई देते हैं। यहां पर आपके लिए यह जानना भी रोचक होगा कि कुछ ईरानी परिवार अपनी धार्मिक आस्थाओं के आधार पर नया साल शुरू होने के समय पवित्र स्थलों के आध्यात्मिक वातावरण में रहना पसंद करते हैं ताकि वहां दफ़्न महान हस्तियों और ईश्वर के निकट उनके उच्च स्थान से अपनी दुआओं के स्वीकार होने के लिए लाभ उठाएं। नए साल के आरंभिक क्षणों में इन पवित्र स्थलों में उपस्थिति और दुआ व प्रार्थना, दिल को एक विशेष संतुष्टि प्रदान करती है। यही कारण है कि हर साल तीर्थ स्थलों विशेष कर पवित्र नगर मशहद में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम, क़ुम में हज़रत मासूमा अलैहस्सलाम और शीराज़ में हज़रत अहमद बिन मूसा के मज़ारों पर नौरोज़ के दिन श्रद्धालुओं की बहुत ज़्यादा भीड़ होती है।

नौरोज़ केवल एक त्योहार और वार्षिक उत्सव नहीं है बल्कि यह सामाजिक इकाइयों को एक दूसरे से जोड़ने वाला बंधन भी है कि यह पर्व अकेले नहीं मनाया जा सकता बल्कि नौरोज़ के समय उन सभी को साथ होना चाहिए। नया साल आरंभ होने के बाद एक बहुत ही अच्छी परंपरा का क्रियान्वयन होता है और वह है अपने परिजनों, रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों से जा कर मिलना। लोग नए साल की तेरहवीं तारीख़ तक मिलने जुलने का क्रम जारी रखते हैं अलबत्ता निकट परिजनों में यह सिलसिला फ़रवरदीन महीने के अंत तक भी जारी रहता है। चूंकि ईरानी संस्कृति में बड़ों और बुज़ुर्गों का विशेष स्थान होता है इस लिए परिवार के छोटे अपना कर्तव्य समझते हैं कि पहले बुज़ुर्गों से मिलने के लिए जाएं। यही कारण है कि जो बच्चे माता-पिता से अलग अपने बाल बच्चों के साथ रह रहे होते हैं वे दादा-दादी, नाना-नानी और माता-पिता से नौरोज़ की मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू करते हैं।

ईरानियों में यह रिवाज है कि जब कोई उनसे मिलने के लिए आता है तो वे भी पलट कर उससे मिलने के लिए जाते हैं। इसी लिए नौरोज़ के अवसर पर परिवार के लोग कई कई बार एक दूसरे से मिलते हैं और उपहारों का आदान-प्रदान होता रहता है। अगर किसी परिवार में कोई मर गया होता है तो उसके रिश्तेदार और मित्र मिल कर उसके घर जाते हैं और घर वालों को सांत्वना देने के साथ ही मृतक के लिए ईश्वरीय क्षमा की दुआ करते हैं। कुछ लोग बीमारों व अकेले रह जाने वालों से मिलने के लिए भी जाते हैं और उन्हें नौरोज़ के अवसर पर ख़ुश करने की कोशिश करते हैं। नौरोज़ के दिनों में अस्पतालों, अनाथालयों और शारिरिक व मानसिक रूप से पिछड़े लोगों के रहने के केंद्रों में भीड़ रहती है और लोग बड़े प्रेम से जा कर इस प्रकार के लोगों से मिलते हैं और उन्हें उपहार देते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि नौरोज़ दोस्ती, सच्चाई और दया व कृपा की ओर एक बड़ा सुंदर पुल है। ईरान के इस प्राचीनता पर्व की एक सबसे सुंदर उपयोगिता, द्वेष की समाप्ति और दिलों को एक दूसरे के निकट लाना है।

नौरोज़ के अवसर पर ईरान में दो चरणों में लगभग पांच पांच दिन की छुट्टियां होती हैं और यह छुट्टियां दोस्तों व रिश्तेदारों से मिलने का बहुत अच्छा अवसर तो हैं ही साथ ही आराम और यात्रा के लिए भी उचित अवसर हैं। ईरान के अधिकतर परिवार नौरोज़ के अवसर पर मिलने वाली छुट्टियों का एक भाग देश के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा से विशेष करते हैं। चूंकि बसंत के मौसम में ईरान की प्रकृति अत्यंत सुंदर होती है इस लिए लोग अवश्य यात्राओं पर जाते हैं। ईरान के उत्तरी क्षेत्र, जहां हरे-भरे जंगल और कैस्पियन सी के तट हैं, नौरोज़ के दिनों में सैलानियों के लिए सबसे आकर्षक समझे जाते हैं।

दक्षिणी ईरान में फ़ार्स की खाड़ी के नीले तट भी अपनी बहारी जलवायु के साथ यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। इसी तरह तेहरान, इस्फ़हान, शीराज़, तबरेज़, यज़्द और मशहद जैसे बड़े शहर भी अपने धार्मिक व ऐतिहासिक आकर्षणों के साथ नौरोज़ के यात्रियों की आवभगत के लिए तैयार रहते हैं। यही कारण है कि नौरोज़ के दिनों को, यात्राओं का मौसम कहा जाता है। देश के विभिन्न शहरों के अधिकारी भी कई हफ़्ते पहले से ही नौरोज़ के दिनों में यात्रियों के स्वागत और उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं।